व्यंग्य: यूट्यूब बनाम टिकटॉक पर बोले रवीश- ये डिजिटल साम्प्रदायिकता है, डर का माहौल है

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नमस्कार, मैं रवीश कुमार। प्राइमटाइम में आपका स्वागत है। आजकल यूट्यूब बनाम टिकटॉक का मुद्दा गरमाया हुआ है। आपने सुना ही होगा। आप सोच रहे होंगे कि मुझ जैसे मँजे हुए वरिष्ठ पत्रकार को इस महत्वहीन मुद्दे में दिलचस्पी भला क्यों होने लगी। दिलचस्पी इसलिए क्योंकि मुद्दा महत्वहीन नहीं, महत्वपूर्ण है।

आप नहीं देख पा रहे क्योंकि इसके पीछे छिपी हुई साजिश को समझने के लिए मैग्सेसे पुरष्कृत पत्रकार जैसी सूझबूझ, परिपक्वता और पारखी नज़र चाहिए जो.. हे हे हे.. आपको पता है कि किसमें है। यूट्यूब बनाम टिकटॉक युवाओं के दो गुटों के बीच पनप रही प्रतिस्पर्धा और वर्चस्व की लड़ाई नहीं है। ये दरअसल एकक्षत्र राज कर रहे अभिजात हिन्दू बहुल यूट्यूब और उसे चुनौती दे रहे वंचित मुस्लिम बहुल टिकटॉक के बीच का संघर्ष है।

आपको ज्ञात हो कि यूट्यूब पर ऊँची जात के हिंदुओं का आधिपत्य है। आशीष चंचलानी, कैरीमिनाती उर्फ अजय नागर, भुवन बाम, हमारा खासमखास ध्रुव राठी, गाली गलौच में पारंगत हिंदुस्तानी भाऊ, इत्यादि सब ऊँची जात के हिन्दू हैं और यूट्यूब पर इनकी तूती बोलती है। इनके रहते यूट्यूब पर कोई भी दलित या अल्पसंख्यक समाज का व्यक्ति पनप नहीं पाया।

समय का पहिया घूमता है और भारत में चाइनीज कम्पनी द्वारा निर्मित एक ऐप टिकटॉक आती है जिसे गरीबों का यूट्यूब भी कहा जाता है। टिकटॉक प्रतिभा होने के बावजूद संसाधन न होने की वजह से दरकिनार हुए गरीबों, अल्पसंख्यकों, वंचितों और पिछड़ों के लिए आशा की किरण बनकर आया।

अब प्रसिद्धि और पैसे पर सिर्फ ऊँची जात के हिंदुओं का आधिपत्य ख़त्म होने का वक्त आ गया था। टिकटॉक पर मिस्टर फैसु, रियाज़ अली, जन्नत ज़ुबैर, आमिर सिद्दकी जैसे वंचित अल्पसंख्यकों को पहचान मिली। पहुँच, पैसे और फॉलोवर्स की गिनती में ये लोग यूट्यूब के सम्पन्न अपर कास्ट हिन्दू पुरुषों से भी आगे निकल गए।

ऐसे में जलन होना स्वाभाविक ही है। यही कारण है कि कैरीमिनाती के छद्मनाम से प्रसिद्ध अजय नागर, जो कि एक ब्राह्मण हैं, एक अल्पसंख्यक आमिर सिद्दकी से भिड़ गए। आमिर उस मुसलमान युवा का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसका बचपन 2002 के दंगों के साये में गुजरा। जिसकी जवानी फासीवादी ताकतों के शोषण में गुज़री।

इतना सहने के बावजूद सिद्दकी अजय नागर से सम्पन्न ब्राह्मण की तरफ यह कहकर दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं कि हम यहाँ एक दूसरे के साथ के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं, वहीं पितृसत्तात्मक ब्राह्मणवाद से लबरेज़ नागर उन्हें ये कहकर ठुकरा देते हैं कि वो उन्हें 200 रुपए के भाव में मिठाई की दुकान पर बेच देंगे।

हेकड़ी देख रहे हैं आप? क्या ऐसे बचेगी गंगा-जमुनी तहज़ीब? अजय नागर साफ साफ यह संदेश देना चाह रहे हैं कि अल्पसंख्यक में चाहे जितनी काबलियत और उपलब्धियाँ हो, वो सवर्ण हिंदुओं की नज़रों में कभी सम्मान नहीं पा सकता। बड़ी विडंबना है।

शायद आपको अब तक समझ आ ही गया होगा कि यूट्यूब बनाम टिकटॉक कोई वर्चस्व की लड़ाई नहीं है। ये एक किस्म का डिजिटल साम्प्रदायिकता है जो कि बहुत दुखद है। चलिए ज़्यादा नहीं कहेंगे क्योंकि फ़ासीवादियों की आलोचना सुनने की क्षमता बहुत कम होती है। पता चला कल हमारे ही नाम पर एफआईआर की घोषणा हो जाए।

डर का माहौल है। शुभरात्रि!

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